उत्तराखंड में बारिश पहाड़ के लिए खुशियों के बजाय साल दर साल दर्द देकर जा रही है। साल 2013 में केदारनाथ में आई त्रासदी के बाद भी पहाड़ में अनियंत्रित तरीके से विकास थम नहीं रहा है, जिसके चलते प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला जारी है। इस साल भी 90 से अधिक लोगों की आपदा के चलते मौत हो गई, जबकि पिछले एक दशक में 5,300 से अधिक लोग असमय काल के गाल में समा चुके हैं। क्या आने वाले समय में हम प्राकृतिक आपदा और विकास के बीच कोई संतुलन बना पाएंगे या हिमालय के सब्र का बांध टूट जाएगा। अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट…शांत मानी जाने वालीं पहाड़ की वादियों में हलचल है। लगातार खिसक रही जमीन और दरकते मकान अब हर बरसात में यहां की नियति बन चुके हैं। कल-कल, छल-छल करतीं नदियां बरसात में उफान पर आती हैं तो यहां के बाशिंदे रातें जागकर गुजारने के लिए विवश हो जाते हैं। कई गांव आपदा के बाद से हाशिए पर हैं, जहां आसमान में बादल घिरते ही लोग घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हैं। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और सिमटती हरियाली से पहाड़ कमजोर हो गए हैं। हर साल प्रकृति की मार से हिमालय के सब्र का बांध टूट रहा है और वह दर्द से कराह रहा है। हाल ही में इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदी केंद्र (एनआरएससी) की रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है।
एनआरएससी की भूस्खलन पर आधारित मानचित्र रिपोर्ट में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में पहाड़ टूटने का खतरा बताया गया था। इसमें रुद्रप्रयाग जिले को देश में भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा बताया गया। भूस्खलन से जोखिम के मामले में देश के 10 सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में टिहरी दूसरे स्थान पर है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड का 72 प्रतिशत यानी 39 हजार वर्ग किमी क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित है।
दो महीने पहले शुरू हुई बारिश के बाद से प्राकृतिक आपदाओं में 90 लोग मौत के मुंह में चले गए जबकि 50 लोग घायल हुए हैं। वहीं 16 लोग अब भी लापता हैं। इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक मौतें भूस्खलन के कारण हुई हैं। इस साल बारिश से प्रदेश को हजार करोड़ से ज्यादा नुकसान हुआ है। 15 जून से शुरू हुए मानसून के बाद से अभी तक सड़कों और पुलों को 53548.85 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है। इस दौरान 3093 सड़कें और 91 पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं। अकेले पुलों को ही सुधारने के लिए 11999.57 लाख रुपये चाहिए। सचिव लोनिवि डॉ. पंकज पांडेय ने बताया कि पुलों और सड़कों की क्षति का यह प्रारंभिक आकलन है।
मौसम की ऐसे पड़ी मार
